गाय-भैंस की सही देखभाल कैसे करें? बीमारी से बचाव और हर साल बच्चा लेने की पूरी जानकारी
गाय-भैंस को स्वस्थ रखने, बीमारियों से बचाने और समय पर गर्भधारण के लिए सही आहार, साफ-सफाई, टीकाकरण और जरूरी देखभाल की पूरी जानकारी आसान भाषा में जानें।

इस लेख में8 अनुभाग
गाय या भैंस पालना केवल चारा-पानी देने का काम नहीं है। पशु को समय पर सही भोजन, साफ पानी, साफ-सफाई, टीके, पेट के कीड़ों की दवा और सही समय पर गर्भधारण की सुविधा मिले तो वह अधिक स्वस्थ रहता है, दूध भी अच्छा देता है और समय पर अगला बच्चा देने की संभावना बढ़ती है।
एक स्वस्थ गाय या भैंस से लगभग हर साल एक बच्चा लेने का लक्ष्य रखा जा सकता है। लेकिन इसके लिए पशु के बच्चा देने के बाद से ही अगले गर्भ की तैयारी शुरू करनी पड़ती है।
1. सबसे पहले पशु के रहने की जगह ठीक रखें
पशु जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसका बाड़ा है।
बाड़ा हमेशा साफ, सूखा और हवादार होना चाहिए। पशु को ऐसी जगह न बांधें जहाँ गोबर और पेशाब जमा रहता हो। गीली और गंदी जगह पर रहने से थन, खुर और त्वचा से जुड़ी परेशानियाँ बढ़ सकती हैं।
गर्मी के दिनों में पशु को तेज धूप से बचाएँ और छाया की अच्छी व्यवस्था रखें। बहुत अधिक गर्मी में पशु हाँफने लगता है, चारा कम खाता है और दूध तथा गर्भधारण दोनों पर बुरा असर पड़ सकता है।
सर्दियों में ठंडी हवा सीधे पशु पर न लगे, लेकिन बाड़े को पूरी तरह बंद भी न करें।
जहाँ संभव हो, पशु को रोज कुछ समय खुली जगह में चलने-फिरने दें।
2. गाय-भैंस को क्या खिलाएँ?
केवल भूसा खिलाकर पशु से अच्छे दूध, अच्छे स्वास्थ्य और समय पर गर्भधारण की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
पशु के भोजन में हरा चारा, सूखा चारा और उसकी जरूरत के अनुसार दाना होना चाहिए।
हरा चारा
मौसम के अनुसार बरसीम, जई, ज्वार, बाजरा, मक्का तथा दूसरे उपलब्ध हरे चारे दिए जा सकते हैं।
अलग-अलग प्रकार के चारे का संतुलित उपयोग करना अच्छा रहता है।
सूखा चारा
गेहूँ का भूसा तथा अन्य साफ और अच्छी गुणवत्ता वाला सूखा चारा दिया जा सकता है।
सड़ा हुआ, फफूंदी लगा या बदबूदार चारा कभी न खिलाएँ।
दाना
दूध देने वाले पशु को केवल पेट भरने के लिए नहीं बल्कि दूध उत्पादन और शरीर की जरूरत के अनुसार संतुलित दाना चाहिए।
पशु कितना दूध दे रहा है, उसका वजन कितना है, वह गर्भवती है या नहीं और उसके शरीर की हालत कैसी है—इन सबके अनुसार दाने की मात्रा बदलती है।
इसलिए सभी पशुओं को एक जैसी मात्रा में दाना देना सही नहीं है।
नमक और खनिज मिश्रण
पशु के भोजन में नमक और अच्छी गुणवत्ता का पशुओं के लिए बना खनिज मिश्रण शामिल करना उपयोगी है।
खनिजों की कमी होने पर पशु की गर्मी कमजोर दिखाई देना, बार-बार गर्भ न ठहरना, कमजोरी और दूध में कमी जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
खनिज मिश्रण की मात्रा उसके पैकेट पर लिखी सलाह या पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार रखें।
सही पशु आहार चुनते समय किन बातों का ध्यान रखें?
बाजार में पशुओं के लिए कई तरह के आहार और खनिज मिश्रण मिलते हैं। केवल सस्ता देखकर कोई भी आहार न खरीदें। पशु की उम्र, दूध की मात्रा, गर्भावस्था और शरीर की स्थिति के अनुसार सही आहार चुनना जरूरी है।
यदि आपके आसपास सही पशु आहार आसानी से उपलब्ध नहीं है, तो किसान सिटी पर पशुओं की जरूरत के अनुसार संतुलित पशु आहार, खनिज मिश्रण, कैल्शियम तथा पशु पोषण से जुड़ी दूसरी जरूरी चीजें देख सकते हैं।
लेकिन ध्यान रखें कि हर पशु की जरूरत एक जैसी नहीं होती। अधिक दूध देने वाली गाय, गर्भवती भैंस, बच्चा देने के बाद कमजोर पशु और छोटे बच्चे की पोषण जरूरत अलग-अलग हो सकती है। इसलिए किसी भी पूरक आहार की मात्रा पशु की जरूरत और उत्पाद पर लिखी सलाह के अनुसार रखें।
किसान सिटी का उद्देश्य केवल सामान उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि किसान को उसकी जरूरत के अनुसार सही जानकारी देकर सही चीज चुनने में मदद करना है।
पशु को जरूरत के अनुसार सही पोषण मिलेगा, तभी उसका शरीर मजबूत रहेगा, दूध उत्पादन अच्छा रहेगा और समय पर गर्भधारण की संभावना भी बेहतर होगी।
3. साफ पानी की कमी बिल्कुल न होने दें
दूध देने वाले पशु को पानी की बहुत आवश्यकता होती है।
पशु को दिन में केवल एक-दो बार थोड़ा पानी देना सही तरीका नहीं है। जहाँ संभव हो, साफ और ताजा पानी पशु की पहुँच में रखें।
गर्मी में पानी की जरूरत और बढ़ जाती है।
पानी की नांद को नियमित रूप से साफ करें। उसमें काई, गोबर या सड़ा हुआ चारा जमा न होने दें।
4. हर साल बच्चा लेने के लिए सबसे जरूरी बात
अच्छी देखभाल में लक्ष्य यह होना चाहिए कि दो बच्चों के बीच का समय लगभग 12 से 14 महीने के आसपास रहे। हर पशु में बिल्कुल 12 महीने होना जरूरी या संभव नहीं है।
इसके लिए बच्चा होने के बाद पशु की अच्छी देखभाल बहुत जरूरी है।
बच्चा होने के बाद पशु के गर्भाशय को सामान्य होने और शरीर को संभलने के लिए समय चाहिए। इस दौरान अच्छा भोजन, साफ पानी और खनिज देना जारी रखें।
5. पशु गर्मी में आया है, कैसे पहचानें?
गाय या भैंस के गर्भधारण के लिए गर्मी पहचानना बहुत जरूरी है।
इन संकेतों पर ध्यान दें:
पशु बार-बार आवाज करता है।
बेचैनी बढ़ जाती है।
दूसरे पशुओं पर चढ़ने या उन्हें अपने ऊपर चढ़ने देता है।
पूँछ बार-बार उठाता है।
जनन अंग के आसपास सूजन दिखाई दे सकती है।
साफ, लसलसा पदार्थ निकल सकता है।
दूध या भोजन में कुछ कमी दिखाई दे सकती है।
पशु बार-बार इधर-उधर देखता या घूमता है।
भैंस में कई बार गर्मी के संकेत गाय की तुलना में कम दिखाई देते हैं। इसलिए भैंस को सुबह जल्दी और शाम या रात में ध्यान से देखना उपयोगी है।
6. गर्मी दिखाई देने पर क्या करें?
गर्मी के सही समय पर गर्भाधान कराना बहुत महत्वपूर्ण है।
समय का अंदाजा लगाने में गलती होने से अच्छे पशु में भी गर्भ नहीं ठहर सकता।
इसलिए गर्मी के लक्षण दिखाई देते ही प्रशिक्षित गर्भाधान कर्मी या पशु चिकित्सक से संपर्क करें और उन्हें बताएं कि गर्मी के लक्षण पहली बार किस समय दिखाई दिए थे। वे पशु की स्थिति देखकर सही समय बता सकते हैं।
एक ही नियम हर पशु पर आँख बंद करके लागू न करें।
7. गर्भ ठहरा या नहीं, इसकी जाँच जरूर करवाएँ
गर्भाधान करवाने के बाद केवल इंतजार करते रहना ठीक नहीं है।
यदि पशु लगभग 18 से 24 दिन में दोबारा गर्मी में आ जाए तो संभव है कि गर्भ न ठहरा हो।
यदि दोबारा गर्मी दिखाई न दे, तब भी गर्भ की पुष्टि करवाना अच्छा रहता है।
आमतौर पर गर्भाधान के लगभग 45 से 60 दिन बाद पशु चिकित्सक से गर्भ की जाँच करवाई जा सकती है।
इससे समय रहते पता चल जाता है कि पशु गर्भवती है या दोबारा प्रयास करने की जरूरत है।
8. बार-बार गर्भाधान के बाद भी गर्भ न ठहरे तो क्या करें?
यदि गाय या भैंस को सही समय पर दो-तीन बार गर्भाधान कराने के बाद भी गर्भ नहीं ठहर रहा है, तो बार-बार बिना जाँच गर्भाधान करवाते न रहें।
इसके कई कारण हो सकते हैं:
पोषण की कमी, खनिजों की कमी, बच्चेदानी की समस्या, संक्रमण, गर्मी का सही समय न पहचान पाना या अन्य प्रजनन संबंधी समस्या।
ऐसे पशु की पशु चिकित्सक से जाँच करवाएँ।
किसी की सलाह पर अपने आप हार्मोन वाला इंजेक्शन लगवाना ठीक नहीं है।
9. बच्चा होने से पहले गर्भवती पशु की देखभाल
गर्भ के आखिरी महीनों में पशु को विशेष देखभाल चाहिए।
उसे फिसलन वाली जगह पर न रखें और मारना, दौड़ाना या अनावश्यक तनाव देना बिल्कुल नहीं चाहिए।
बच्चा होने का समय पास आने पर साफ और सूखी जगह तैयार रखें।
दूध देने वाली गर्भवती गाय या भैंस को अगला बच्चा होने से लगभग दो महीने पहले दूध निकालना बंद करने की आवश्यकता पड़ती है, ताकि उसके शरीर और आने वाले बच्चे को पर्याप्त आराम और पोषण मिल सके। सही समय पशु की स्थिति के अनुसार पशु चिकित्सक से तय किया जा सकता है।
10. बच्चा होने के समय किन बातों का ध्यान रखें?
बच्चा होने के समय पशु को साफ, सूखी और शांत जगह पर रखें।
सामान्य प्रसव में बिना जरूरत हाथ डालना या बच्चे को जोर लगाकर खींचना नुकसान कर सकता है।
यदि पशु काफी देर से जोर लगा रहा हो लेकिन बच्चा बाहर न आए, बच्चा गलत स्थिति में दिखाई दे, बहुत अधिक खून आए या पशु बहुत कमजोर हो जाए तो तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएँ।
देरी माँ और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक हो सकती है।
11. बच्चा होने के बाद सबसे जरूरी देखभाल
बच्चा होने के बाद माँ और बच्चे दोनों पर विशेष ध्यान दें।
नवजात बच्चे की नाक और मुँह के आसपास जमा गंदगी साफ करें और देखें कि वह ठीक से साँस ले रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण है माँ का पहला गाढ़ा दूध।
बच्चे को जन्म के बाद जितनी जल्दी संभव हो पहला गाढ़ा दूध जरूर पिलाएँ। शुरुआती घंटों में दिया गया यह दूध बच्चे को बीमारियों से बचाने में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
12. बच्चा होने के बाद जेर का ध्यान रखें
बच्चा होने के बाद जेर अपने आप बाहर आती है।
जेर को हाथ से जोर लगाकर खींचना नहीं चाहिए।
यदि जेर समय पर न निकले, पशु को बुखार हो, बदबूदार पदार्थ निकले, पशु खाना छोड़ दे या बहुत सुस्त हो जाए तो पशु चिकित्सक को बुलाएँ।
13. थन की बीमारी से कैसे बचाएँ?
दूध देने वाले पशुओं में थन की बीमारी बड़ा नुकसान कर सकती है।
दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथ साफ होने चाहिए।
थन और उसके आसपास की गंदगी साफ करें। दूध निकालने की जगह भी साफ रखें।
दूध निकालते समय दूध में अचानक दाने, फटे दूध जैसा पदार्थ, खून, पानी जैसा दूध या असामान्य बदलाव दिखाई दे तो इसे नजरअंदाज न करें।
थन गर्म, कठोर, सूजा हुआ या दर्द वाला लगे तो पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
14. खुरों की देखभाल भी जरूरी है
पशु लगातार गीली और गंदी जगह पर खड़ा रहेगा तो खुरों की समस्या बढ़ सकती है।
बाड़े से गोबर और पेशाब नियमित रूप से हटाएँ।
यदि पशु लंगड़ाकर चले, खुर में सूजन हो, घाव दिखाई दे या बदबू आए तो जल्दी जाँच करवाएँ।
लंगड़ापन होने से पशु कम खाता है और गर्मी के संकेत भी ठीक से नहीं दिखा पाता।
15. पेट के कीड़ों से बचाव
पेट के कीड़े पशु को अंदर से कमजोर कर सकते हैं। इससे पशु दुबला रह सकता है और उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
लेकिन हर पशु को बिना सोचे-समझे बार-बार कीड़ों की दवा देना भी सही नहीं है।
पशु की उम्र, वजन, क्षेत्र और पहले दी गई दवा को ध्यान में रखते हुए पशु चिकित्सक की सलाह से कीड़ों की दवा दें।
छोटे बच्चों के लिए भी अलग योजना बनवाएँ।
16. टीके समय पर जरूर लगवाएँ
बीमारी होने के बाद इलाज कराने से बेहतर है कि गंभीर संक्रामक बीमारियों से पहले ही बचाव किया जाए।
अपने क्षेत्र के पशु चिकित्सालय से गाय-भैंस के लिए टीकाकरण की वार्षिक सूची बनवा लें।
क्षेत्र के अनुसार खुरपका-मुँहपका, गलघोंटू, लंगड़ा बुखार तथा अन्य रोगों से बचाव के टीके लगाए जा सकते हैं।
कौन-सा टीका कब लगना है, यह क्षेत्र और सरकारी कार्यक्रम के अनुसार बदल सकता है। इसलिए स्थानीय पशु चिकित्सक की सलाह सबसे महत्वपूर्ण है।
हर टीके की तारीख लिखकर रखें।
17. बाहर से नया पशु खरीदकर लाएँ तो सीधे झुंड में न मिलाएँ
नया पशु देखने में स्वस्थ लग सकता है, लेकिन उसके साथ बीमारी भी आ सकती है।
नए खरीदे पशु को कुछ समय बाकी पशुओं से अलग रखें और पशु चिकित्सक से उसकी जाँच, टीकाकरण तथा आवश्यक बचाव के बारे में सलाह लें।
बीमार पशु को भी स्वस्थ पशुओं से अलग रखना अच्छा रहता है।
18. गर्मियों में भैंस की खास देखभाल
भैंस को गर्मी ज्यादा परेशान कर सकती है।
गर्मियों में अच्छी छाया, हवा और पर्याप्त साफ पानी की व्यवस्था करें।
जहाँ सुरक्षित और साफ व्यवस्था उपलब्ध हो, वहाँ भैंस के शरीर को ठंडा रखने के उपाय करें।
बहुत अधिक गर्मी के कारण भैंस कम खा सकती है और उसकी गर्मी के लक्षण भी कमजोर दिखाई दे सकते हैं।
19. बीमारी आने से पहले पशु को रोज देखें
एक अच्छा पशुपालक अपने पशु को रोज ध्यान से देखता है।
सुबह और शाम कुछ मिनट देखकर जाँचें:
पशु ठीक से खा रहा है या नहीं।
जुगाली कर रहा है या नहीं।
सामान्य मात्रा में पानी पी रहा है या नहीं।
गोबर सामान्य है या नहीं।
नाक या आँख से असामान्य पानी तो नहीं आ रहा।
पेट असामान्य रूप से फूला तो नहीं है।
पशु लंगड़ा तो नहीं रहा।
थन में सूजन या गर्मी तो नहीं है।
दूध अचानक कम तो नहीं हुआ।
पशु बहुत सुस्त या अलग तो नहीं खड़ा है।
पशु के सामान्य व्यवहार को जानना बीमारी जल्दी पकड़ने का सबसे अच्छा तरीका है।
20. इन लक्षणों में तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएँ
यदि पशु खाना-पीना छोड़ दे, तेज बुखार जैसा लगे, साँस लेने में परेशानी हो, पेट तेजी से फूल जाए, खड़ा न हो पाए, बहुत अधिक दस्त हों, मुँह से अत्यधिक लार आए, दूध में खून आए, बच्चा देने में परेशानी हो, गर्भावस्था में खून आए या पशु अचानक बहुत कमजोर हो जाए तो घरेलू उपचार में समय बर्बाद न करें।
तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
21. हर पशु की एक छोटी कॉपी बनाएँ
यह बहुत आसान तरीका है और बड़े काम का है।
हर गाय या भैंस के लिए लिखें:
पशु का नाम या संख्या: ________
पिछला बच्चा कब हुआ: ________
गर्मी कब दिखाई दी: ________
गर्भाधान कब हुआ: ________
गर्भ की जाँच कब हुई: ________
अगला बच्चा लगभग कब होगा: ________
टीका कब लगा: ________
पेट के कीड़ों की दवा कब दी: ________
दूध कितना दे रहा है: ________
इससे किसी जरूरी काम की तारीख भूलने की संभावना कम हो जाती है।
स्वस्थ पशु के 10 सुनहरे नियम
साफ और सूखा बाड़ा रखें।
हर समय पर्याप्त साफ पानी दें।
हरा चारा, सूखा चारा और जरूरत के अनुसार संतुलित दाना दें।
पशु के लिए बना खनिज मिश्रण और नमक उचित मात्रा में दें।
समय पर टीकाकरण करवाएँ।
पशु चिकित्सक की सलाह से पेट के कीड़ों का नियंत्रण करें।
सुबह-शाम पशु को ध्यान से देखें।
गर्मी के लक्षण पहचानकर सही समय पर गर्भाधान करवाएँ।
गर्भाधान के बाद गर्भ की जाँच जरूर करवाएँ।
बच्चा देने, गर्भाधान, गर्भ जाँच और टीकों की तारीख लिखकर रखें।
याद रखें
अच्छा चारा + साफ पानी + साफ बाड़ा + समय पर टीका + सही समय पर गर्भाधान + रोज थोड़ी निगरानी = स्वस्थ गाय-भैंस और बेहतर पशुपालन।
हर साल बच्चा देने की कोई पक्की गारंटी नहीं होती, क्योंकि प्रत्येक पशु की उम्र, स्वास्थ्य, पोषण और प्रजनन क्षमता अलग होती है। लेकिन सही देखभाल से दो बच्चों के बीच का समय कम रखने और नियमित गर्भधारण की संभावना काफी बेहतर की जा सकती है।
किसी बीमारी में बिना पशु चिकित्सक की सलाह के इंजेक्शन, हार्मोन या दवा न दें। दवा की मात्रा पशु के वजन, उम्र, गर्भावस्था और बीमारी के अनुसार अलग हो सकती है।
किसान सिटी के साथ पशुओं की बेहतर देखभाल
स्वस्थ पशु की शुरुआत सही देखभाल और सही पोषण से होती है। सही चीज चुनने में परेशानी हो तो, अपने पशु के लिए संतुलित पशु आहार, खनिज मिश्रण, कैल्शियम तथा दूसरी पशु पोषण संबंधी जरूरतों के लिए आप किसान सिटी पर उपलब्ध विकल्प देख सकते हैं। अपने पशु की उम्र, दूध की मात्रा, गर्भावस्था और वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखें और जरूरत पड़ने पर पशु चिकित्सक की सलाह लें।



